उत्तराखंड का इतिहास | History of Uttrakhand

 उत्तराखंड का इतिहास

उत्तराखण्ड का इतिहास, विशेषकर पौराणिक इतिहास बहुत गौरवपूर्ण है। 

उत्तराखण्ड पहाड़ों, घाटियों, जंगलों तथा नदियों से युक्त यह क्षेत्र आदि काल से ही तपस्वियों, तीर्थ यात्रियों तथा राजाओं के आकर्षण का केन्द्र रहा है।

विभिन्न कालों (प्रागैतिहासिक, आद्यऐतिहासिक तथा ऐतिहासिक) के अनुक्रम में राज्य का संक्षिप्त इतिहास इस प्रकार है।

उत्तराखंड के समृद्ध इतिहास का उल्लेख केवल हमारे इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में किया गया है, बल्कि मध्यकालीन युग की पवित्र पुस्तकों में भी लिखा गया है। इसके अलावा, उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत एक अलग कहानी कहती है क्योंकि विभिन्न युगों के ऐतिहासिक स्मारकों, स्थलों और पवित्र स्थानों को देखा जा सकता है। कहा जाता है कि पहाड़ों के राजा हिमालय को पांच खंडों यानी नेपाल कुर्मांचल, केदार, कांगड़ा और रुचिर कश्मीर से मिलकर बनाया गया है। यह मध्य हिमालयी क्षेत्र गढ़वाल और कुमाऊं, जिसे आज आमतौर पर उत्तराखंड के नाम से जाना जाता है, को पुराणों में केदारखंड और मानसखंड के नाम से जाना जाता है। प्रसिद्ध इतिहासकार श्री शिव प्रसाद डबराल के अनुसार केदारखंड से उत्तरापद और खंड शब्द लेकर उत्तराखंड शब्द का निर्माण हुआ। हालांकि यह पर्वतीय क्षेत्र वही है, जो कभी वैदिक काल में अपने बर्फ से ढके रूप में प्रसिद्ध था और उसके गौरवशाली कर्मों की गाथा गाता था।उस समय के राजा, संत और तपस्वी।

इसे उपनिषदों के संकलनकर्ताओं द्वारा उत्तरपंचल, वाल्मीकि द्वारा उत्तरकौशल और महाकाव्य महाभारत को लिखने वाले वेद व्यास द्वारा उत्तरकुरु के रूप में संदर्भित किया गया था। यह वही स्थान है जो पाणिनि और कौटिल्य के लिए उत्तरापट्टी था; किरातों के लिए कीरतमंडल, खास के लिए खाशादेश, कटायुरों के लिए कार्तिपुर। यह प्रारंभिक इतिहासकारों के लिए पर्वतकरण और गिर्यावली और वर्तमान राजनेताओं के उत्तरांचल या उत्तराखंड थे।

  • उत्तराखंड के अलगअलग हिस्सों को अलवरत, ब्रह्मपुर, रुद्रहिमालय, सपलदक्ष, शिवालिक, कुर्मांचत करजात कमाउगढ़, कामदेश, कुमाऊं, सरकार और गढ़वाल पिछले 3000 साल से प्रेमी हैं। इस क्षेत्र के पश्चिमी भाग जिसमें 52  किले शामिल हैं, को कहा गया है पिछले 500 वर्षों में गढ़वाल। संप्रत, चमोली, पौड़ी, उत्तरकाशी और देहरादून गढ़वाल क्षेत्र की सुंदरता में चार चांद लगाते हैं। पूर्वी क्षेत्र अल्मोड़ा, नैनीताल और पिथौरागढ़ जिलों को मिलाकर कुमाऊं क्षेत्र के रूप में जाना जाता है।
  • उत्तराखण्ड का इतिहास,सुरक्षा कारणों से सरकार ने पिछले चार दशकों से केवल चमोली और पिथौरागढ़ जिलों को उत्तराखंड माना है, लेकिन उत्तराखंड के निवासियों के लिए यह पूरा पहाड़ी क्षेत्र 51,125 वर्ग किमी के क्षेत्र में शामिल है और इसमें 15,951 गांव, 89 विकास खंड शामिल हैं। और कुछ समीपवर्ती मैदान भौगोलिक सामाजिक और सांस्कृतिक इकाई के संकेत के रूप में। उत्तराखंड राज्य के इतिहास को गढ़वाल और कुमाऊं संभागों के अलगअलग इतिहास के माध्यम से बेहतर ढंग से समझा जा सकता है, क्योंकि उन्होंने नेपाली आक्रमण की अवधि को छोड़कर स्वतंत्र पहचान बनाए रखी।

प्रागैतिहासिक काल

राज्य के विभिन्न स्थलों से प्राप्त होने वाले पाषाणोपकरण, गुफा, शैल चित्र, कंकाल, मृदुभाण्ड तथा धातुउपकरण प्रागैतिहासिक काल में मानव निवास की पुष्टि करते है। इस काल के प्रमुख साक्ष्य अधोलिखित है।

  • लाखु गुफा- 1968 में खोजे लाखु उड्यार या गुफा, जो कि अल्मोड़ा के बाड़ेछीना के पास सुयालनदी तट पर स्थित है, से मानव तथा पशुओं के चित्र प्राप्त हुए हैं। मानव आकृतियों को अकेले  या समूह में नृत्य करते दिखाया गया है। विभिन्न पशु पक्षियों का भी चित्रण किया गया है। चित्रों को रंगों से भी सजाया गया हैं।
  • ग्वारख्या गुफा चमोली में अलकनंदा नदी के किनारे डुग्री गांव के पास स्थित ग्वारख्या उड्यार या गुफा से मानव, भेड़, बारहसिंगा, लोमड़ी आदि के रंगीन चित्र मिले हैं जो लाखु गुफा के चित्रों से अधिक चटकदार हैं।
  • किमनी गांव चमोली के थराली के पास स्थित किमनी गांव के गुफा से हल्के सफेद रंग से चित्रित हथियार एवं पशुओं के शैलचित्र मिलें है।
  • मलारी गांव  चमोली जिले में सुदूर तिब्बत सीमा से सटे मलारी गाँव में गढ़वाल विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं को सन् 2002 में हजारों वर्ष पुराना नर कंकाल, मिट्टी के बर्तन, जानवरों के अंग और 5.2 किलों का एक सोने का मुखावरण आदि अवशेष मिले हैं। विद्वानों के अनुसार यह नर कंकाल और मिट्टी के बर्तन ईसा के 2000 वर्ष पूर्व से 6वीं शती ईसा पूर्व तक के हैं। और बर्तन पाकिस्तान की स्वात घाटी के शिल्प के समान हैं।
  • ल्वेथाप अल्मोड़ा के ल्वेथाप से प्राप्त शैलचित्र में मानव को शिकार करते तथा हाथों में हाथ डालकर नृत्य करते दिखाया गया है।
  • हुडली उत्तरकाशी के हुडली से प्राप्त शैल चित्रों में नीले रंग का प्रयोग किया गया है।
  • पेटशाल अल्मोड़ा के पेटशाल पूनाकोट गांवों के बीच स्थित कफ्फरकोट से प्राप्त नृत्यरत मानवाकृतियाँ कत्थई रंग से रंगें हैं।
  • फलसीमाअल्मोड़ा के फलसीमा से योग तथा नृत्य मुद्रा वाली मानवआकृतियाँ मिली है।
  • रामगंगा घाटी रामगंगा घाटी से पाषाणकालीन शवगार और कपमार्क्स मिले हैं।

गढ़वालगढ़वाल क्षेत्र के कई स्थलों से चित्रित धूसर मृद्रभाण्ड के साक्ष्य मिले हैं।

प्रागैतिहासिक काल का मानव प्रायः गुफाओं में निवास करता था और उसकी दीवारों को सुन्दरसुन्दर चित्रों से सजाता था अपने भोजन की पूर्ति वह शिकार करके विभिन्न फलों, कंदो का नो संग्रहण करके करता था। कालान्तर में वह आग से भी परिचित हो गया था।

आद्यऐतिहासिक
काल

पुरातात्विक साक्ष्यों की कमी के कारण राज्य के आद्य इतिहास प्रमुख स्रोत विभिन्न धार्मिक ग्रंथ है। इसी कारण इस काल को पौराणिक काल(आद्यऐतिहासिक काल) भी कहा जाता हैं। इस काल के महत्वपूर्ण तथ्य अधोलिखित हैं इस काल का विस्तार चतुर्थ शताब्दी से ऐतिहासिक काल तक माना गया है। इस युग के लोगों को लौहताम्र धातुओं, कृषि पशुपालन तथा ग्रामीणनगरीय सभ्यता से परिचित होने के साक्ष्य मिलते हैं। जैसे बहादराबाद से प्राप्त ताम्रसंचय, मलारी तथा रामगंगा घाटी से विभिन्न सामग्रियों के साथ प्राप्त महापाषाणीय शवाधान अवशेष आदि।

  • उत्तराखण्ड का प्रथम उल्लेख हमें ऋग्वेद से प्राप्त होता है, जिसमें इस क्षेत्र को देवभूमि एवं मनीषियों की पूर्ण भूमि कहा गया
  •  वेदों के अलावा इसका उल्लेख उपनिषदों, ब्राह्मण ग्रंथों, पुराणों, रामायण तथा महाभारत आदि धार्मिक ग्रंथों से भी प्राप्त होता है। इन ग्रंथों में इस क्षेत्र को पूर्णभूमि, ऋषिभूमि तथा पवित्र क्षेत्र कहा गया है।
  •  ऐतरेव ब्राह्मण में यहाँ उत्तर– –कुरूओं का निवास होने के कारण इस क्षेत्र के लिए उत्तरकुरु शब्द का प्रयोग किया गया है।
  •  स्कन्दपुराण में 5 हिमालयी खंडों (नेपाल, मानसखंड, केदारखंड, जालंधर एवं कश्मीर) का उल्लेख है, जिनमें से दो खंडों (मानसखण्ड औरकेदारखण्ड) का सम्बंध वर्तमान उत्तराखण्ड राज्य से है।
  • उपरोक्त पुराण में मायाक्षेत्र (हरिद्वार) से हिमालय तक के विस्तृत क्षेत्र को केदारखण्ड (गढ़वाल क्षेत्र) तथा नन्दा देवी पर्वत से कालागिरि तक के क्षेत्र को मानसखण्ड (वर्तमान कुमाऊँक्षेत्र) कहा गया है। नन्दा देवी पर्वत इन दोनों खंडो
    की विभाजन  रेखा पर स्थित है।
  • पुराणों में मानसखंड और केदारखण्ड के संयुक्त क्षेत्र को
    कर उत्तर- खण्ड, ब्रहापुर एवं खसदेश आदि नामों से सम्बोधित कियागया है।
  • बौद्ध साहित्य के पालिभाषा वाले ग्रंथों में उत्तराखण्ड क्षेत्र
    के लिए हिमवंत शब्द प्रयुक्त किया गया है।

गढ़वाल क्षेत्र
वैदिक काल में इस क्षेत्र को
हेमवत
, महाभारत में ‘उत्तरकुरू’ तथा पुराणकाल में ‘केदारखण्ड’
कहा जाता था, जबकि पुराणोत्तर काल में इस क्षेत्र को केदारमण्डल, बद्रिकाक्षेत्र, तपोभूमि
व किरात मण्डल आदि नामों से जाना जाता था। कालांतर में इस क्षेत्र के 52 गढ़ो (पहाड़ी
किलों)
को पवार शासक अजयपाल द्वारा विजित कर लेने के बाद गढ़वाल नाम
होने लगा।

  • गढ़ों का निर्माण
    इस क्षेत्र की बहुत प्राचीन विशेषता रही हैं। ऋग्वेद में वर्णित है कि इस क्षेत्र के
    असुर राजा शम्बर के 100 गढ़ों को देवराज इन्द्र और सुदास ने नष्ट कर दिया था।
  • ऋग्वेद के अनुसार प्रलय के बाद इस क्षेत्र के प्राणा ग्राम
    में सप्तऋषियों ने अपने प्राणों की रक्षा की और यहीं से पुनः सृष्टि प्रारम्भ हुई तथा
    मरीच, अंगीरा, अत्रि, अगस्त्य, भृगु, वशिष्ट, मनु आदि वंशों की परम्परा शुरु हुई। यहाँ
    के अल्कापुरी (कुबेर की राजधानी) नामक स्थान को मनुष्यों के आदि पूर्वज मनु
    का निवास स्थल कहा जाता है।
  • ब्रह्मा के मानस पुत्रों दक्ष, मरीचि, पुलस्त्य, पुलह,
    ऋतु और अत्रि
    का निवास स्थल गढ़वाल ही था।
  • हरिराम धस्माना, भजनसिंह और डॉ शिवानन्द नौटियाल आदि इतिहासकारों
    का मत है कि ऋग्वेद में जिस ‘सप्तसिंधु’ देश का उल्लेख है वह गढ़भूमि (गढ़वाल) ही है।
    इस क्षेत्र के बद्रीनाथ के पास स्थित गणेश, नारद, मुचकुंद, व्यास एवं स्कंध आदि । गुफाओं
    में ही वैदिक ग्रंथों की रचना की गयी थी। ऋग्वेद में वर्णित सरस्वती नदी का सम्बंध
    भी यहीं से है।
  • टिहरी गढ़वाल की एक पट्टी (हिमयाण) में विसोन नामक पर्वत
    पर वशिष्ट गुफा, वशिष्ट कुंड एवं वशिष्टाश्रम है। ऐसा माना जाता है कि राम के वनवास
    चले जाने पर वशिष्ट मुनि और उनकी पि पत्नी अरूंधती ने यहीं निवास किया था।
  • गढ़वाल क्षेत्र के देवप्रयाग की सितोनस्यूं पट्टी में सीता
    जी पृथ्वी में समायी थीं। इसी कारण यहाँ (मनसार में ) प्रतिवर्ष मेला में लगता है।
  • देवप्रयाग में भगवान राम का एक मंदिर है और ऐसी मान्यता है
    कि भगवान राम ने अंतिम समय में यहाँ पर तपस्या की थी।
  • टिहरी गढ़वाल जिले में लक्ष्मण जी ने जिस स्थान पर तपस्या
    किया था उसे तपोवन कहा जाता है।
  • रामायणकालीन बाणासूर का भी राज्य इसी गढ़वाल क्षेत्र में
    था और इसकी राजधानी ज्योतिषपुर (जोशीमठ) थी।
  • महाभारत के वन पर्व में हरिद्वार से केदारनाथ (भृंगतुंग) तक के यात्रा में पड़ने वाले स्थानों का वर्णन मिलता है।
    इस पर्व में बद्रीनाथ की भी चर्चा की गयी है। इसी पर्व में लोमश ऋषि के साथ पांडवो
    के इस क्षेत्र में आने का उल्लेख है। मान्यता है कि कुन्ती व द्रौपदी सहित पाण्डव यहीं
    से स्वर्गलोक गये थे।
  • महाभारत के वनपर्व के अनुसार उस समय इस क्षेत्र में पुलिंद
    (कुणिन्द) एवं किरात जातियों का आधिपत्य था। राजा सुबाहु की राजधानी श्रीनगर थी। इसने
    पाण्डवों की ओर से युद्ध में भाग लिया था।
  • सुबाहु के बाद राजा विराट का उल्लेख है, जिसकी राजधानी जौनसार
    के पास विराटगढ़ी मे थी। इसी की पुत्री से अभिमन्यु का विवाह हुआ था।
  • प्राचीन काल में इस क्षेत्र में बदरिकाश्रम और कण्वाश्रम
    नामक दो प्रसिद्ध विद्यापीठ थे। इनमें से कण्वाश्रम दुष्यन्त और शकुन्तला के प्रेम-प्रसंग
    के कारण विशेष रूप से प्रसिद्ध है। इसी आश्रम में चक्रवर्ती सम्राट भरत का जन्म
    हुआ था, जिनके नाम परअपने देश का नाम भारत पड़ा।
  • महाकवि कालिदास ने अपने महाकाव्य
    अभिज्ञान शाकुन्तलम् की रचना मालिनीनदी के तट पर स्थित इसी कण्वाश्रम में ही की
    थी
    । वर्तमान में इस स्थान को चौकाघाट कहा जाता है।

धार्मिक ग्रंथों में कहीं-कहीं केदारखसमण्डले शब्द का प्रयोग
किया गया है। इस शब्द के अनुरूप केदारखंड को खस प्रदेश का पर्यावाची माना गया है। विद्वानों
का मत है कि प्राचीन काल में गढ़वाल क्षेत्र में खस जाति के लोग बहुत सशक्त थे। खसों
के समय गढ़वाल क्षेत्र में बौद्ध मत का प्रचार-प्रसार अधिक था। कुछ विद्वान इन्हें
आर्य मानते हैं।

कुमाऊँ क्षेत्रपौराणिक ग्रंथों के अनुसार चंपावत के पास (चंपावत नदी के
पूर्व) स्थित कच्छप के पीठ की आकृति वाले कांतेश्वर पर्वत ( वर्तमान नाम कांडादेव या
कानदेव) पर विष्णुभगवान का कूर्मा या कच्छपावतार हुआ था। कालांतर में इस पर्वत के नाम
पर मानसखण्ड के इस क्षेत्र को कूर्मांचल (संस्कृत शब्द) कहा जाने लगा। आगे चलकर यहीं
कूर्मांचल शब्द प्राकृत में कुमूं और हिन्दी में कुमाऊँ हो गया।

  • प्रारम्भ में केवल चंपावत के आस-पास के क्षेत्रों को ही कुमाऊँ
    कहा जाता था
    , लेकिन आगे चलकर वर्तमान अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, 
    बागेश्वर, तथा ऊधमसिंह नगर
    वाले सम्पूर्ण क्षेत्र को कुमाऊँ कहा जाने लगा।
  • कुमाऊँ का सर्वाधिक उल्लेख स्कन्दपुराण के मानसखण्डमें मिलता
    है।
  • ब्रह्म एवं वायुपुराण के अनुसार यहाँ किरात, किन्नर, यक्ष,
    गंधर्व, विद्याधर, नाग आदि जातियाँ निवास करती थी
  • महाभारत में भी कूर्मांचल क्षेत्र में किरात, किन्नर, यक्ष,
    तंगव,- कुलिंद, तथा खस आदि जातियों के निवास करने का उल्लेख है।
  • जाखन देवी मंदिर (अल्मोड़ा) का अस्तित्व अत्यन्त प्राचीन काल
    में इस क्षेत्र में यक्षों के निवास करने की पुष्टि करता है।
  •  कुमाऊँ क्षेत्र में
    बीनाग या बेनीनाग, धौलनाग, कालीनाग, पिंगलनाग, खरहरीनाग, बासुकीनाग आदि नाग देवता के
    मंदिरों की उपस्थि प्राचीन काल में नाग जाति के लोगों के निवास करने को प्रमाणित करता
    है। ।
  • उपरोक्त नाग मन्दिरों में सबसे प्रसिद्ध मंदिर पिथौरागढ़
    का बीनाग या बेनीनाग
    हैं।
  • अपने स्वतंत्र भाषाई अस्तित्व (मुंडा भाषा) के साथ
    किरातों के वंशज आज भी कुमाऊँ के अस्कोट एवं डोडीहाट नामक स्थानों पर निवास करते हैं।
  • बाद की कुमाऊँ की जातियों में खस का उल्लेख मिलता
    है जो कि बहु सशक्त थी। इनके समय मे बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार अधिक हुआ था। कुमाऊँ
    में राजपूतों के प्रवेश से पहले खसों का ही प्रभुत्व था।

उत्तराखंड राज्य के कुछ जिलों का इतिहास:-

  1. देहरादून
  2. चमोली
  3. बागेश्वर
  4. नैनीताल
  5. हरिद्वार

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