प्रमुख स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व राजनीतिज्ञ


कालू महरा 


उत्तराखण्ड के इस प्रथम स्वतंत्रता सेनानी का जन्म 1831 में वर्तमान चम्पावत जिले के लोहाघाट के पास स्थित विसुड़ गांव में हुआ था। 1857 के क्रांति के दौरान इन्होंने कुमाऊँ क्षेत्र में गुप्त संगठन (क्रांतिवीर) बनाकर अंग्रेजों के खिलाफ आन्दोलन चलाया। उस समय कुमाऊँ के कमिश्नर हेनरी रैमजे थे। इनकी मृत्यु 1906 में हुई।


बद्रीदत्त पाण्डे  


यद्यपि इनका मूल निवास एवं शिक्षा स्थल अल्मोड़ा था, लेकिन जन्म 15 फरवरी 1882 को कनखल (हरिद्वार) में हुआ था। 1913 से वे अल्मोड़ा से प्रकाशित ‘अल्मोड़ा अखबार ‘ के सम्पादक बने। अंग्रेजी शासन के प्रति तीखे और व्यंग्यात्मक लेखों के कारण तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर ने अखबार को सन 1918 में प्रतिबंधित कर दिया। इसके बाद उन्होंने अल्मोड़ा से शक्ति साप्ताहिक का प्रकाशन शुरू कर दिया।


कुली बेगार, कुली उतार व कुली बर्दायश आदि प्रथाओं के विरुद्ध आंदोलन में उनके सफल नेतृत्व के लिए बद्रीदत्त पाण्डे को कुर्माचल केसरी की पदवी से विभूषित किया गया।


जेल में उन्होंने कुमाऊँ का इतिहास लिखा।


उन्होंने 1962 में भारत-चीन युद्ध के समय देश के सुरक्षा कोष में 2 स्वर्ण पदक दे दिया था।


1937 में केंद्रीय एसेम्बली; 1946 में उत्तर प्रदेश में कॉउन्सलर और 1955 में लोकसभा सदस्य निर्वाचित हुए। 13 जनवरी सन 1965 को उनका निधन हुआ।


हरगोविन्द पंत 


इनका जन्म 19 मई 1885 को चितई गांव, अल्मोड़ा में हुआ था । कुमाऊँ के कुलीन ब्राह्मणों द्वारा हल न चलाने की प्रथा को 1928 में बागेश्वर में उन्होंने स्वयं हल चलाकर तोड़ दिया। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान वे 1930, 1932 और 1940 में जेल गये।


उन्हें अल्मोड़ा कांग्रेस की रीढ़ कहा जाता था। भारत छोड़ो आन्दोलन के समय अल्मोड़ा में सबसे पहले इन्हीं को नजरबंद किया गया था।


1937 में वे उ.प्र. एसेम्बली, 1946 में प्रांतीय एसेम्बली तथा 1957 में लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए । उनका निधन मई 1957 में हुआ।


बैरिस्टर मुकुन्दीलाल  


इनका जन्म 14 अक्टूबर 1885 को पाटली गाँव (चमोली) में हुआ था। 1913 से 1919 के बीच इंग्लैण्ड में कानून की पढ़ाई के दौरान इनका तिलक से परिचय हुआ और राजनीतिक सक्रियता में वृद्धि हुई । परिणामस्वरूप इंग्लैण्ड से लौटने पर (1919 में) इन्हें गिरफ्तार करके नैनी (इलाहाबाद) जेल में डाल दिया गया।


सन् 1926 में वे स्वराज दल के टिकट पर गढ़वालसे चुनाव जीते थे। 1962 से 1967 तक उन्होंने लैसडोन विधान सभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। इसके बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति से सन्यास ले लिया।


राजनीति को त्यागने के बाद अपना जीवन ‘गढ़वाली’ साहित्य और कला के पुनरुत्थान में लगा दिया। गढ़वाल चित्रकला शैली के प्रसिद्ध चित्रकार मौलाराम के चित्रों को खोजकर उन्हें कला जगत में प्रसिद्धि के शिखर पर पहुँचाने में उनका महत्वपूर्ण योगदान है। वर्ष 1969 में प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘गढ़वाल पेटिंग्स’ भारतीय चित्रकला का अमूल्य ग्रन्थ है। 10 जनवरी, 1982 को उनका निधन हो गया।


खुशीराम आर्य  


इनका जन्म 13 दिसम्बर, 1886 को दौलिया, हल्दूचौड़, नैनीताल में हुआ था। वे आर्यसमाजी विचारधारा के व्यक्ति थे। उन्होंने दलितों में व्याप्त कुप्रथाओं जैसे बाल विवाह, मदिरापान, छुआछूत आदि की समाप्ति के लिए संपूर्ण कुमाऊँ क्षेत्र में जागरुकता फैलाया। शिल्पकार सुधारिणी सभा का गठन कर शिल्प विद्यालयों का संचालन किया। दलितों को शिल्पकार नाम प्रदान करने में वे अग्रणी रहे।


सन 1946 में वे कांग्रेस के टिकट पर विधान सभा के लिए चुने गये और 1967 तक विधानसभा के सदस्य रहे। 5 मई 1971 को उनका निधन हो गया।


बलदेव सिंह आर्य 


इनका जन्म 1912 में पौढ़ी के उमथ गांव में हुआ था। ये एक स्वाधीनता संग्राम सेनानी, लोकप्रिय जन ई प्रतिनिधि, राजनेता, समाजसेवी, हरिजनोत्थान को समर्पित तथा गांधीवादी विचारक थे ।


सर्वाधिक लम्बी अवधि तक विधायक और मंत्रीपद को सुशोभित करने वाले ये उत्तराखंड के पहले विधायक थे। कई वर्षों तक अखिल भारतीय हरिजन सेवक संघ के उपाध्यक्ष रहे। 1950 में ये सर्वप्रथम प्रोविजनल पार्लियामेन्ट के सदस्य मनोनीत हुए । उसके बाद ये 1952, 57, 62, 74, 80 85 में विधानसभा और 1968 से 1974 तक विधान परिषद के सदस्य रहे। प्रायः सभी बार ये मन्त्रिमण्डल के भी सदस्य रहे। इनका देहान्त  1995 में हो गया।


पं. गोविन्द बल्लभ पंत  


इनका जन्म 10 सितम्बर, 1887 को ग्राम खूंट, अल्मोड़ा में हुआ था। पं. जवाहर लाल नेहरू जी ने इन्हें ‘हिमायल पुत्र’ की उपाधि से विभूषित किया था। उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर उनके सहपाठी उन्हें गोविन्द बल्लभ ‘महाराष्ट्र’ कहा करते थे। 1946 में उन्हें उत्तर प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री बनने का गौरव प्राप्त हुआ। और इस पद पर दिसम्बर 1954 तक रहे। 


पं. गोविन्द बल्लभ पंत के जीवन से सम्बन्धित प्रमुख घटनाएँ इस प्रकार हैं –


1909 में इलाहाबाद से कानून की डिग्री लेने के बाद उन्होंने काशीपुर में वकालत शुरू की। हिन्दी के प्रचार हेतु 1914 में काशी नागरी प्रचारिणी सभा की एक शाखा के रूप में काशीपुर में ‘प्रेमसभा’ की स्थापना की थी। इसके बाद 1916 में कुमाऊँ परिषद के गठन में अहम भूमिका निभाई। 1923 में स्वराज्य पार्टी के टिकट पर नैनीताल जिले से संयुक्त प्रांत की विधान परिषद के सदस्य निर्वाचित हुए, जबकि 1927 में उन्हें संयुक्त प्रांत की कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष चुना गया। 


1934 में वे अखिल भारतीय संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष तथा केन्द्रीय विधानसभा के सदस्य निर्वाचित हुए। 1937 में इनके नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में पहला कांग्रेसी मंत्रिमण्डल बना


उन्हें कांग्रेस कार्यकारिणी के सदस्यों के साथ 9 अगस्त 1942 को मुम्बई में गिरफ्तार किया गया और अहमदनगर के किले में 31 मार्च 1945 तक नजरबंद रखा गया ।


1946 में पुनः उत्तरप्रदेश विधानसभा के लिये निर्वाचित हुए और मुख्यमंत्री बने और इस पद पर वे दि. 1954 तक रहे। 10 जन. 1955 को केन्द्रीय कैबिनेट में गृहमंत्री के रूप में सम्मिलित हुए और देहावसान तक इस पद पर पदासीन रहे।


भारत रत्न की उपाधि से 26 जनवरी 1957 को सम्मानित किया गया। पक्षाघात के कारण  7 मार्च, 1961 को इनका निधन हो गया।

 

हर्षदेव औली 


काली कुमाऊँ के शेर के नाम से विख्यात हर्ष देव ओली का जन्म 4 मार्च 1890 को ग्राम गोसानी (खेतीखान) चम्पावत में हुआ था। इन्होंने कई अखबारों में कार्य किया। कुली उतार, कुली बेगार व कुली बर्दायश आंदोलन में सक्रिय योगदान दिया। 1929 में लाहौर कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में उन्होंने कुमाऊँ क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया।

1930 में जंगलात कानून के विरुद्ध सविनय अवज्ञा आन्दोलन चलाया। 5 जून 1940 को नैनीताल में उनका निधन हो गया।

अनुसुया प्रसाद बहुगुणा 


‘गढ़ केसरी’ नाम से विख्यात अनुसुया प्रसाद बहुगुणा का जन्म 18 फरवरी 1894 को पुण्यतीर्थ अनुसुया देवी मे हुआ था। वह एक सफल वकील थे। कुली बेगार तथा स्वतंत्रता आन्दोलन में वे काफी सक्रिय रहे। 1921 में उन्हें ‘गढ़वाल युवा सम्मेलन’ (श्रीनगर) का अध्यक्ष चुना गया था। 1931 में वे जिला बोर्ड के चेयरमैन नियुक्त हुए। 23 मार्च 1943 को उनका देहान्त हो गया।


प्रयागदत्त पंत 


इनका जन्म 1898 में पिथौरागढ़ के हलपाटी चण्डाक में हुआ था। इलाहाबाद से अपनी उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद 1921 में असहयोग आन्दोलन में कूद पड़े और गांव-गांव में जाकर अंग्रेजी कानून और शासन के विरोध में प्रचार करने लगे। इसी बीच सरकार ने कुमाऊँ में धारा 144 और जुबान बन्दी का आदेश जारी  किया था। आदेश का उल्लंघन करने पर उन्हें बन्दी बनाकर एक वर्ष की कड़ी कैद की सजा दी गयी तथा बरेली सेंट्रल जेल में रखा गया। सन् 1935 में अल्प आयु में उनका निधन हो गया।


बिहारी लाल चौधरी  


सारे देश में चुनाव द्वारा एक आम सीट पर निर्वाचित होने वाले वे प्रथम हरिजन सदस्य थे। 1929 में इन्होंने लाहौर के ऐतिहासिक कांग्रेस अधिवेशन में भाग लिया। नमक सत्याग्रह में इन्हें पांच अन्य प्रमुख नेताओं के साथ गिरफ्तार किया गया था। 1936 में प्रान्तीय असेम्बली के लिए आम क्षेत्र से निर्वाचित हुए। 1937 में संयुक्त प्रान्त के कांग्रेसी मन्त्रिमण्डल पदारूढ़ हुआ। तो चौधरी साहब विजय लक्ष्मी पण्डित के संसदीय सचिव नियुक्त हुए। 1940 में 42 वर्ष की आयु में पूना में इनका निधन हो गया।


मोहन सिंह मेहता 


इनका जन्म 1897 में बागेश्वर जिले के 1 बज्यूला (कत्यूर) गांव में हुआ था। कत्यूर क्षेत्र में स्वराज प्राप्ति हेतु जन – जागरण में इनकी प्रमुख भूमिका रही। 1921 में कत्यूर में ‘कुमाऊँ परिषद’ की शाखा गठित की और कुली-बेगार के विरुद्ध आन्दोलन का नेतृत्व किया। अनाथों के आर्य अनाथालय, ग्राम – सुधार समिति, कताई-बुनाई प्रचार केन्द्र, शिशु पालन समिति जैसे कई सामाजिक कार्यों की बुनियाद रखी। उत्तराखण्ड से जेल जाने वाले ये प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। 1957 से 1966 तक ये उ.प्र.वि.स. के सदस्य रहे। 1988 में इनका निधन हुआ।


इन्द्र सिंह नयाल (1902-1994) 


ये स्वाधीनता संग्राम सेनानी एवं राजनेता के साथ-साथ एक लेखक, समाज सेवी तथा गांधीवादी जननायक भी थे। 1932 में अल्मोड़ा में आयोजित, ‘कुमाऊँ युवक सम्मेलन’ के अध्यक्ष निर्वाचित हुए। भारत छोड़ो आन्दोलन में नैनीताल जिले से कई नवयुवकों पर विध्वंसात्मक कार्यों के कारण राजद्रोह का मुकदमा चला। नयाल जी ने उनकी मुफ्त पैरवी कर अपनी निस्वार्थ देश सेवा का परिचय दिया। ‘कुमाऊँ का योगदान’ नामक पुस्तक 1973 में लिखी।


भवानी सिंह रावत 


इनका जन्म 8 अक्टूबर 1910 को पौढ़ी (दुगड्डा) के नाथूपुर पंचुर गांव में हुआ था। आजाद के नेतृत्व वाले ‘हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातांत्रिक संघ’ के उत्तराखण्ड से यह एक र मात्र सदस्य थे। 1930 में वे पुलिस से बचने के लिए आजाद व हैं अन्य साथियों को अपने पैतृक गांव ले आए थे और करीब एक सप्ताह तक रहे थे। यहाँ पास के जतंगल में आजाद ने पिस्टल की ट्रेनिंग लिया था ।


आजाद की शहादत तक उन्होंने अपना फरारी जीवन आजाद के साथ व्यतीत किया। उसके बाद विदेश भागने का प्रयास करते समय 1931 में बम्बई में पुलिस द्वारा पकड़े गए और मुकदमा र चलाया गया। सरकार द्वारा दिल्ली षड्यंत्र केस की सुनवाई के लिए च गठित ट्रब्यूनल को भंग किए जाने के परिणामस्वरूप फरवरी 1933 में रिहा हो गए। दुगड्डा (पौढ़ी) में उन्होंने शहीद मेले की शुरुआत की, जो आज भी लगता है। 6 मई 1986 को रुड़की में उनका निधन हो गया।


जगमोहन सिंह नेगी  


इनका जन्म 1905 में हुआ था। ये स्वतंत्रता सेनानी के साथ-साथ एक जन सेवी, राजनेता, साहित्य प्रेमी, स्पष्ट वक्ता और लोकप्रिय जन प्रतिनिधि भी थे। 1930 के देशव्यापी सत्याग्रह आन्दोलन में भागीदारी के कारण इन्हें जेल यात्रा करनी पड़ी। उत्तराखण्ड के जनप्रतिनिधित्व इतिहास में नेगी जी का लगातार पांच बार विधानसभा में प्रवेश का एक रिकार्ड है। 30 मई 1968 को इनका देहान्त हो गया ।


महावीर त्यागी  

इनका जन्म 1899 में हुआ था। प्राथमिक शिक्षा के बाद ये फौज में भर्ती हो गये। प्रथम विश्व युद्ध में ईरान भेजे गए, किन्तु राष्ट्रीय विचारों का व्यक्ति होने के कारण कोर्ट मार्शल कर फौज से निकाल दिए गए। इसके बाद ये असहयोग आन्दोलन में कूद पड़े। पूरे स्वतंत्रा अन्दोलन के दौरान ये 11 बार जेल गये और लगभग साढ़े सात वर्ष जेल में ही रहे।

1938 और 1946 में प्रान्तीय कौन्सिल के लिए निर्वाचित हुए। प्रथम आम चुनाव में देहरादून संसदीय क्षेत्र से लोकसभा के में लिए निर्वाचित हुए। स्वतंत्रता आन्दोलन के दिनों इन्हें ‘देहरादून का सुल्तान’ कहा जाता था। सन् 1923 से लगातार ये 44 वर्षों तक अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य रहे। 1980 में इनका निधन हो गया ।


सोबन सिंह जीना  


इनका जन्म 1909 में कुमाऊँ में हुआ था। कुमाऊँ में इन्होंने कुमाऊँ राजपूत परिषद का गठन कर इसके माध्यम से इन्होंने क्षत्रिय समाज में सुधार लाने के लिए सक्रिय भूमिका निभाई। अंग्रेजी सरकार ने इन्हें ‘रायबहादुर’ की पदवी देकर सम्मानित किया था। वे कुमाऊँ में ‘भारतीय जनसंघ’ के संस्थापक सदस्यों में से एक थे। ‘भारतीय जनता पार्टी के गठन पश्चात् ये इसके जिला अध्यक्ष बनाए गए। 1977 में वारामण्डल विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीते और पर्वतीय विकास मन्त्री बनाए गए। 1989 में उनका देहान्त हो गया।


श्रीधर किमोठी ‘आजाद’ 


इनका जन्म 1919 में चमोली के चन्द्रशीला भिकोन ग्राम में हुआ था। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान कई बार जेल गये। इन्होंने स्वतंत्रता के बाद अनेक सामाजिक कार्य किये। नवम्बर 2005 में इनका निधन हो गया।


परिपूर्णानन्द पैन्यूली 


इनका जन्म नवम्बर 1924 में टिहरी के छोल गांव में हुआ था। इन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई और 6 वर्ष तक बंदी जीवन व्यतीत किया। जेल से मुक्त होने के बाद ये ‘टिहरी राज्य प्रजा मण्डल’ में सम्मिलित हुए। 1946 में टिहरी में राजद्रोह के मामले में इन्हें 1 साल 6 महीने के कठोर कारावास की सजा हुई पर जेल से फरार हो गए और रामेश्वर शर्मा के नाम से दिल्ली में क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े रहे। 


1977 में पूर्व नरेश मानवेन्द्र शाह को पराजित कर सांसद निर्वाचित हुए। वे दर्जनभर पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। जिनमें से देशी राज्य और जन आंदोलन, नेपाल का पुनर्जागरण और संसद और संसदीय प्रक्रिया काफी चर्चित पुस्तकें हैं।


उत्तरप्रदेश हरिजन सेवक संघ के सचिव के तौर पर इन्होंने 1950 के दशक में हरिजनों को श्री बदरीनाथ, श्री केदारनाथ, गंगोत्तरी व यमनोत्तरी धामों में सवर्णों के भारी विरोध के बावजूद प्रवेश कराया। 1996 में भारतीय दलित साहित्य अकादमी ने इन्हें ‘डॉ. अम्बेडकर आवार्ड’ देकर सम्मानित किया।


डॉ. भक्त दर्शन  


इनका जन्म 12 फरवरी 1912 को पौढ़ी जिले के भौराड़ गांव में हुआ था। 14 जनवरी 1921 को बद्रीदत्त पाण्डेय के नेतृत्व में जब कुली-बेगार प्रथा का अंत करने के लिए कुली-बेगार रजिस्टर को सरयू में बहाया गया तो, इस घटना से प्रभावित होकर 14 वर्षीय भक्तदर्शन ने जीवन भर खादी पहनने और विदेशी वस्त्रों के बहिस्कार का व्रत लिया। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान गाँधी जी के सम्पर्क में आने के बाद इन्होंने अपने नाम के आगे से जातिवाचक शब्द भी हटा दिया और जीवन पर्यन्त केवल भक्तदर्शन ही बने रहें ।


1939 में इनके और भैरवदत्त धुलिया के सम्यकादत्व में लैंसडोन (पौढ़ी) से ‘कर्मभूमि’ नामक साप्ताहिक अखबार का प्रकाशन शुरू हुआ।


इन्होंने कुल चार बार गढ़वाल से लोकसभा में प्रतिनिधित्व किया। बाद में कानपुर वि.वि. के कुलपति तथा उ.प्र. हिन्दी संस्थान के उपाध्यक्ष भी रहे।


12 वर्ष के प्रयासों के बाद उन्होंने गढ़वाल की दिवंगत विभूतियां नामक पुस्तक लिखी। इसके अलावा उन्होंने ‘सुमन स्मृति र ग्रंथ’, कलाविद मुकुन्दीलाल बैरिस्टर स्मृति ग्रंथ व ‘स्वामी रामतीर्थ क स्मृति ग्रंथ लिखी।


श्रीदेव सुमन


इनका जन्म मई 1916 में टिहरी के जौल गांव में हुआ। इन्होंने देहरादून के हिन्दू नेशनल कालेज में पढ़ाते हुए उच्च शिक्षा में कई डिग्रिया ली। 1930 में 14 वर्ष की अल्प आयु में इन्होंने देहरादून में नमक सत्याग्रह में भाग लिया और 15 दिन का जेल काटा था। 1938 में श्रीनगर में आयोजित राजनैतिक सम्मेलन जिसमें नेहरू, विजयलक्ष्मी पंडित आदि नेताओं ने भाग लिया था।


23 जनवरी 1939 को देहरादून में ‘टिहरी राज्य प्रजा मण्डल’ की स्थापना के पश्चात् उन्होंने इस संगठन को नई दिशा दी। 


फरवरी 1939 में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में लुधियाना (पंजाब) में आयोजित अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद के अधिवेशन में श्रीदेव उन्होंने प्रजा मण्डल के प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया था। इसमें उन्हें हिमालयी प्रान्तीय देशी राज्यों का सच्चा प्रतिनिधि माना गया था। सन 1942 में प्रजा मण्डल की सफलता के लिए वे सेवाग्राम, वर्धा में महात्मा गाँधी से मिलने गये थे। वापस आने पर टिहरी राज्य की पुलिस ने उन्हें राज्य की सीमा के हर निकाल दिया। 

21 फरवरी, 1944 को श्रीदेव सुमन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया। 29 फरवरी 1944 को उन्होंने जेल कर्मचारियों के दुर्व्यवहार के विरोध में अनशन प्रारम्भ किया और तीन मांगें (प्रजा मण्डल को मान्यता दें; मुझे पत्र व्यवहार करने की स्वतंत्रता दी जाए; और मेरे विरुद्ध झूठे मुकदमों की अपील राजा स्वयं सुने) राजा के पास भेजी और कहा कि यदि 15दिन में इन मांगों का उत्तर न मिला तो मैं आमरण अनशन प्रारम्भ कर दूंगा। उत्तर न मिलने पर उन्होंने 3 मई, 1944 से अपना आमरण अनशन प्रारम्भ किया। 84 दिनों की भूख हड़ताल के पश्चात् शहीद हो गए। 

हेमवती नन्दन बहुगुणा 


धरती पुत्र/ हिमपुत्र के नाम से विख्यात बहुगुणा जी का जन्म 25 अप्रैल 1919 को पौढ़ी के बुधाड़ी गावं में हुआ था। 1937 में उच्च शिक्षा के लिए ये इलाहाबाद आये और यहाँ छात्र आन्दोलनों का नेतृत्व करने लगे। 1957 में ये सर्वप्रथम कांग्रेस से विधानसभा के लिए चुनाव जीते और पंत जी के सरकार में संसदीय सचिव बने। 1972 में इलाहाबाद से लोकसभा के लिए विजयी हुए। लेकिन एक वर्ष बाद ही नवम्बर 1973 में इंदिरा जी ने उ.प्र. का मुख्यमंत्री बनाकर भेजा। 1975 में एमरजेन्सी के समय इंदिरा जी से मनमुटाव होने के कारण मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया।


1979 में उन्होंने लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी का गठन किया और अपनी पार्टी से 1982 में गढ़वाल संसदीय सीट से विजयी से होकर मंत्री बने। 1984 में चरण सिंह के साथ ‘दलित मजदूर किसान पार्टी’ का गठन कर इला. से संसदीय चुनाव लड़े, लेकिन अमिताभ से हार गये।


‘इण्डियन नाइज हम’ इनकी पुस्तक है। 17 मार्च 1989 को उनका निधन हो गया।


महाराजा मानवेन्द्रशाह  


इनका जन्म 1921 में टिहरी के प्रताप नगर में हुआ था। 25 अक्टूबर 1946 को इनका राजतिलक हुआ। ध्यातव्य है कि राजतिलक के पूर्व से ही टिहरी की जनता रियासत के खिलाफ आन्दोलनरत थी और समाधान के लिए ‘टिहरी राज्य प्रजा मण्डल का गठन किया गया था। जनता और टिहरी पुलिस के बीच निरन्तर संघर्ष जारी था। अतः भारत सरकार के हस्तक्षेप से ‘अंतरिम सरकार’ गठित की गई, जिसमें आनंदशरण रतूड़ी, खुशाल सिंह, डॉ. कुशलानन्द गैरोला आदि शामिल थे।


जनता के लम्बे संघर्ष के परिणामस्वरुप 1 अगस्त 1949 को टिहरी रियासत का भारत में विलय हो गया। विलय के तुरन्त बाद (1952 में ) उन्होंने पृथक राज्य का मांग उठाया था।


शाह टिहरी से 2004 में 8वीं बार लोकसभा के लिए चुनाव जीते थे। सर्वप्रथम 1957 से लगातार तीन बार (1957, 62, 67) फिर 1991 से लगातार 5 बार चुनाव जीते। 5 जनवरी 2007 को सांसद रहते ही उनका निधन हो गया


नारायण दत्त तिवारी 


विकास पुरुष के नाम से विख्यात श्री तिवारी का जन्म अक्टूबर 1924 में नैनीताल के बल्यूटी गांव (हल्द्वानी) में हुआ था। इन्होंने इलाहाबाद वि.वि. से राजनीति शास्त्र में एम.ए. व एल.एल.बी. किया और छात्रसंघ के अध्यक्ष भी रहे। 1965 में कांग्रेस में सम्मिलित हुए और 1969 और 74 में काशीपुर विधानसभा सीट से विधायक चुने गये और जनवरी 1976 में पहली बार उ.प्र. के मुख्यमंत्री बने। 1980 में नैनीताल लोकसभा के लिए जीते और केन्द्र में योजना मंत्री बने और अगस्त 1984 में दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। जून 1988 में तीसरी बार मुख्यमंत्री बने।


2 मार्च, 2002 को उत्तराखण्ड (प्रथम निर्वाचित सरकार) के मुख्यमंत्री बने और अगस्त 2002 में रामनगर विधानसभा क्षेत्र से निर्वाचित हुए। 7 मार्च, 2007 तक वे राज्य के मुख्यमंत्री रहे। अगस्त 2007 से कुछ महिनों तक वे आन्ध्रप्रदेश के राज्यपाल रहे। 18 अक्टू 2018 को 93 वर्ष की आयु में इनका निधन हो गया।


कृष्ण चन्द्र पंत 


इनका जन्म 10 अगस्त, 1931 को ग्राम – खूंट, अल्मोड़ा में पं. गाविन्द बल्लभ पंत के पुत्र के रूप में हुआ था। इन्होंने लखनऊ वि.वि. से एम.एससी. तथा जर्मनी से डाक्टरेट की उपाधि ली। 1962 में पहली बार नैनीताल से कांग्रेस के टिकट पर जीतकर सांसद, 1967 में मंत्री, 1973-74 तक केन्द्र में गृह राज्य मंत्री, 1989 में केन्द्र में जनता दल की सरकार में वे रक्षा मंत्री रहे। 1946 में मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष रहे। 1997 में वे भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए और उन्हें दसवें वित्त आयोग का अध्यक्ष एवं बाद में योजना आयोग का उपाध्यक्ष नियुक्त किया था।


डॉ. मुरली मनोहर जोशी 


इनका जन्म 5 जनवरी, 1934 को ग्राम-गल्ली, जनपद- अल्मोड़ा में हुआ था। 1958 में इन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से भौतिकी में एम.एससी. और फिर डी.फिल. की उपाधि ग्रहण की और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में ही अध्यापन कार्य करने लगे। 1994 में विभागाध्यक्ष (भौतिकी विभाग) के पद से सेवानिवृत्त हुए।


ये आरएसएस से जुड़े थे और जनसंघ पार्टी के सदस्य थे। 1977 में जनसंघ का जनता पार्टी में विलय होने के बाद नवगठित भाजपा पार्टी के पहले प्रदेश सचिव बने और अल्मोड़ा से सांसद बने। ‘भारतीय जनता पार्टी’ का अध्यक्ष रहते हुए सन् 1992 में इन्होंने कन्याकुमारी से कश्मीर तक एकता यात्रा की और आतंकवादियों की धमकी के बाद भी 15 अगस्त 1992 को श्रीनगर (कश्मीर) के लाल चौक में राष्ट्रीय ध्वज फहराया। बाजपेयी के मंत्रिमण्डल में ये मानव संसाधन विकास मंत्री रहे ।


मेजर जनरल भुवनचंद्र खंडूरी 


इनका जन्म 1 अक्टूबर, 1933 को देहरादून में हुआ था। इनका पैतृक गांव महर गांव में (मरगदना) पौड़ी गढ़वाल के पट्टी नांदलस्यू में पड़ता है। स्नातक की शिक्षा के बाद एनडीए के जरिए 1954 में सेना के इंजीनियर कोर में कमीशन प्राप्त किये थे । जनवरी 1982 में इन्हें अतिविशिष्ट सेवा मैडल मिला। भारतीय सेना से अवकाश प्राप्त करने के बाद इन्होंने सक्रिय राजनीति में हिस्सा लिया और भारतीय जनता पार्टी की उत्तर प्रदेश शाखा के उपाध्यक्ष नियुक्त हुए और 1991 में गढ़वाल से लोक सभा सदस्य चुने गये। 1996 से 98 तक छोड़कर राज्य के चौथे मुख्यमंत्री चुने जाने तक ये गढ़वाल से सांसद रहे। 8 मार्च 2007 को इन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण की और सितम्बर 2007 में धुमाकोट विधानसभा से उपचुनाव जीता। 

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