उत्तराखंड के प्रमुख अनुसूचित जनजातियों का संछिप्त परिचय | Major Scheduled Tribes Uttarakhand

उत्तराखंड राज्य की प्रमुख अनुसूचित जनजातियाँ  जौनसारी, थारू, भोटिया, बोक्सा और राजी हैं। उत्तराखंड राज्य के प्रमुख अनु. जनजातियों के शारीरिक संरचना, उत्पत्ति, निवास स्थल, व्यवसाय तथा सामाजिक व्यवस्था आदि से सम्बंधित संक्षिप्त परिचय अधोलिखित हैं।

जौनसारी

जौनसारी राज्य का दूसरा बड़ा जनजातीय समुदाय है, लेकिन गढ़वाल क्षेत्र का सबसे बड़ा जनजातीय समुदाय है। प्रजातीय दृष्टि से ये इण्डों आर्यन परिवार के हैं, जो कि अपनी विशिष्ट वेशभूषा, परम्पराओं, सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों व सुदृढ़ अर्थव्यवस्था के लिए जाने जाते हैं। इनका मुख्य निवास स्थल लघु हिमालय के उत्तरी-पश्चिमी भाग का भॉवर क्षेत्र है। इस क्षेत्र के अन्तर्गत देहरादून का चकराता, कालसी, त्यूनी, लाखामंडल आदि क्षेत्र, टिहरी का जौनपुर क्षेत्र तथा उत्तरकाशी का परग नेकाना क्षेत्र आता है। देहरादून का कालसी, चकराता व त्यूनी तहसील को जौनसार बाबर क्षेत्र कहा जाता है। 

जौनसार बावर क्षेत्र में कुल 39 खते (पट्टी) व 358 राजस्व गांव हैं।

जौनसार बावर क्षेत्र की मुख्य भाषा जौनसारी है। बावर के कुछ क्षेत्र में बावरी भाषा, देवघार में देवघारीहिमाचली भाषा भी बोली जाती है। लेकिन पठन-पाठन हिन्दी में किया जाता है।


प्रजाति एवं जाति


ये मंगोल एवं डोमों प्रजातियों के मिश्रित लक्षण वाले होते हैं।

यह जनजाति खसास, कारीगर और हरिजन खसास नामक तीन वर्गों में विभाजित है।

खसास वर्ग में ब्राह्मण व राजपूत, कारीगर वर्ग में लोहार, सोनार, नाथ, जोगी, बागजी बढ़ई आदि और हरिजन खसास वर्ग में डोम, कोल्टा, कोली व मोची आदि जातियां आती हैं। समाज में सबकी प्रतिष्ठा है।

वेशभूषा


इनके पुरुष सर्दियों में ऊनी कोट व ऊनी पाजामा (झंगोली) तथा ऊनी टोपी (डिगुबा) पहनते हैं। जबकि स्त्रियां ऊनी कुर्ता, ऊनी घाघरा व ढॉट (एक बड़ा रूमाल) पहनती हैं। गर्मियों में इनके पुरूष चूड़ीदार पायजामा, बंद गले का कोट व सूती टोपी तथा स्त्रियां सूती घाघरा व कुर्ती कमीज (झगा) पहनती हैं और कुर्ते के बाहर चोली (चोल्टी) पहनती हैं। ये ऊन व अन्य चीजों से निर्मित रंग-बिरंगी जूते (आल) पहनते हैं। आधुनिकता के दौर में पैंट-कोट तथा साड़ी ब्लाउज का प्रचलन बढ़ रहा है।

आवास


जौनसारी लोग अपना घर लकड़ी और पत्थर से बनाते हैं जो दो या तीन या चार मंजिलों का होता है। घर का मुख्य द्वार लकड़ी का बना होता हैं, जिस पर विभिन्न प्रकार की सजावट की जाती है।

सामाजिक संरचना


इनमें पितृसत्तात्मक प्रकार की संयुक्त परिवार प्रथा पाई जाती है। परिवार का मुखिया सबसे बड़ा पुरुष सदस्य होता है, जो परिवार की संपत्ति का देखभाल करता है। इनकी सामाजिक व्यवस्था में पूर्ण रूप से सहभागिता दिखाई देती है। अब एकल परिवार की प्रवृत्ति बढ़ रही है।

पहले इनमें बहुपति विवाह का प्रचलन था। लेकिन अब यह प्रथा लुप्त हो चुकी है। अब इनमें ‘बेवीकी’, बोईदोदीकी और बाजदिया आदि प्रकार के विवाह प्रचलित हैं। इन तीनों प्रकार के विवाहों में बाजदिया सबसे शान शौकत प्रकार का विवाह है, जिसमें कन्या पक्ष से वर के घर बाजे-गाजे के साथ बारात जाती है। बेवाकी सबसे साधारण विवाह है। विवाह-विच्छेद के लिए पति-पत्नी दोनों को ही समान रूप से अधिकार प्राप्त है।

पितृ गृह में लड़की ( ध्यंति ) को घर एवं कृषि कार्यों का प्रशिक्षण दिया जाता है। विवाहोपरांत लड़की (रयान्ती) का निवास अपने पति का घर होता है।

इनके रिश्ते-सम्बंधों में कन्य पक्ष को उच्च माना जाता है। समाज में महिलाओं को सम्माननीय स्थिति प्राप्त हैं।

धर्म


लगभग सम्पूर्ण जौनसारी हिन्दू धर्म को मानते हैं। ये महासू, (बासक, पिबासक, भूथिया या बौठा, चलता या चलदा व देवलाड़ी), पांडव व भरदाज आदि देवी-देवताओं को अपना कुलदेव एवं संरक्षक मानते हैं। ‘महासू’ (महाशिव ) इनके सर्वमान्य एवं महत्वपूर्ण देवता हैं। कुछ लोग महासू को विष्णु का 6वां अवतार मानते हैं। कुछ लोग भूत-प्रेतों, डाकिनी-शाकिनी तथा परियों की भी पूजा करतें हैं।

देहरादून में रहने वाले जौनसारी अपने को पांडवों का वंशज बताते हैं। इनके प्रमुख देवता पांचों पांडव तथा पंचमाता (कुन्ती) इनकी देवी है।

ये लोग पत्थर और लकड़ी के मंदिर बनाते हैं ।

हनौल इनका प्रमुख देवालय है। इसके अलावा लाखा मण्डल, थैनाकालसी में भी इनके मंदिर हैं।

इनका एक संग्रहालय होता है जहां ये अपनी-कलात्मक वस्तुओं को रखते हैं। इनके देवता इनके लोक कलाओं के संरक्षक हैं।

सांस्कृतिक गतिविधियां


बिस्सू (वैशाखी), पंचाई या पांचो (दशहरा), दियाई ( दीपावली), माघत्यौहार, नुणाई, जागड़ा, अठोई (जन्माष्टमी) आदि इनके विशिष्ट त्योहार, उत्सव व मेले हैं। 

दीपावली इनका विशेष पर्व है, जिसे ये राष्ट्रीय दीपावली के ठीक एक माह बाद मनाते हैं। इस अवसर पर वे दीपक के बजाय अपने आंगन में भिमल लकड़ी का हौला जलाते हैं और पाण्डवों एवं महासू के गीत गाते हैं। इस हौला को किसी खेत में ले जाकर भयलो खेलते हैं। दूसरे दिन (भिरूड़ी को) इनके पुरूष पत्तेबाजी नृत्य करते हैं ।

पंचाई या दशहरा को यहां की भाषा में ‘पांडव’ का त्योहार कहते हैं। ‘पांडव’ अश्विन शुक्ल षष्ठी या सप्तमी तिथि को होती है। उस दिन कहीं-कहीं मेला भी लगता है। विजय दशमी को स्थानीय भाषा में ‘पांयता’ कहा जाता है।

जागड़ा ‘महासू’ देवता का त्यौहार है जो भादों के महीने में मनाया जाता है। उस दिन महासू देवता को मंदिर से ले जाकर टोंस नदी में स्नान कराया जाता है।

माघ-त्यौहार 11 या 12 जनवरी से प्रारम्भ होकर पूरे माघ भर चलता है। इसमें लोग भेड़ बकरा काटते हैं और एक-दूसरे को भोज देते हैं। पूरे महीने लोग रात को बारी-बारी से सबके घर जाकर नाचते-गाते हैं ।

प्रायः अप्रैल में पड़ने वाला वैशाखी या बिस्सू मेला वैशाखी से चार दिन पर्यन्त तक मनाया जाता है। इन चार दिनों में चौंलीथात, ठाणा डांडा, चौरानी, नागथात, लूहनडांडा, घिरटीनगाय डांडे आदि स्थानों पर मेले लगते हैं। इसमें चावल से बने पापड़ जिन्हें ज स्थानीय भाषा में ‘लाडू’ एवं ‘शाकुली’ कहा जाता है, इन मेलों के मुख्य पकवान हैं। यह जौनसार बावर का सबसे बड़ा मेला माना जाता है। इन मेलों को ‘गनयात’ भी कहते हैं।

नुणाई त्यौहार सावन के महीने में, जहां भेड़ पालन अधिक होता है, मनाया जाता है।

दशहरे को ये पांचों के रूप में मनाते हैं। इस अवसर पर मेले आश्विन शुक्ल षष्ठी या सप्तमी तिथि को लगते हैं। 

जन्माष्टमी इनमें ‘अठोई’ के रूप में मनाया जाता है।

वीर केसरी मेला 3 मई को ‘चौलीथात’ में अमर शहीद केसरी चंद के बलिदान दिवस के रूप में मनाया जाता है। 

इनके अतिरिक्त इस क्षेत्र में कुछ विशेष प्रकार के मेले (मौण) भी लगते हैं। जैसे – मछमौण जतरियाडो मौण आदि ।

मछमौण में लोग किसी गाड (छोटी नदी) में तिमूर (तेजबल झाड़ी) का पाउडर डालकर मछलियों को बेहोश कर देते है और सामूहिक रूप से उन मछलियों को पकड़ते हैं। इसमें केवल पुरुष ही भाग लेते हैं।

जतरियाडो मौण में कई खतों को मिलाकर एक साथ बड़ा मेला लगभग 25-26 वर्षों में एक बार लगता है। पहले इसमें लोग अपने हथियारों व गाजे-बाजे के साथ उपस्थित होते और शक्ति परीक्षण करते थे। डूंग्यारा, साहिया, पाटे व मीनस के मौण बहुत प्रसिद्ध हैं।

हारूल (परात नृत्य), रासों, घूमसू, झेला, छोड़ो, धीई, घुण्डचा, जंगबाजी, सराई, हृदया, सामूहिक मंडवणा, तांदी, मरोज, णैन्ता, ठुमकिया, बराडी गाण्डिया, रास रासो, झेला, पाण्डववला, पौणई, रेणारात, अंडे-कांडे, पत्तेबाजी आदि इनके नृत्य हैं।

हारूल, मांगल, छोड़े, शिलोंगु, केदारछाया, गोडवडा, रणारात, विरासू आदि इनके प्रमुख लोकगीत है।

तलवार, फरसा, कटार, जमदन्द आदि इनके प्रमुख हथियार हैं।

आर्थिक गतिविधियां


कृषि एवं पशुपालन इनका मुख्य व्यवसाय है। खसास (ब्राह्मण और राजपूत) जौनसारी काफी संपन्न होते हैं। ये कृषि भूमि के मालिक होते हैं।

कारीगर वर्ग के जौनसारी अपनी कारीगरी और मजदूरी से जीविका चलाते हैं और प्रायः आत्मनिर्भर होते हैं।

तीसरा वर्ग (हरिजन खसास वर्ग) आर्थिक व सामाजिक दृष्टि से पहले काफी पिछड़ा हुआ था, किन्तु सरकारी व इनके स्वयं के प्रयासों से इनकी स्थति में निरन्तर सुधार हो रहा है।

हरिजन खसास वर्ग की कोल्टा जनजाति की सामाजिक और आर्थिक दशा बहुत दयनीय है। उत्तराखण्ड सरकार इनके सामाजिक व आर्थिक स्थिति में सुधार हेतु प्रयास कर रही है।

राजनीतिक संस्था


जौनसार बावर क्षेत्र में 358 राजस्व ग्राम व 39 खते (पट्टियां) हैं। पहले यहाँ प्रत्येक गांव में गांव पंचायत की जगह ‘खुमरी’ नामक समिति होती थी। गांव के प्रत्येक परिवार का एक सदस्य खुमारी का सदस्य होता था। खुमरी के मुखिया को ‘ग्राम सयाणा’ कहा जाता था। व्यक्तिगत मामलों का निपटारा खुमरी द्वारा किया जाता था।

खुमरी से ऊपर खत स्तर पर प्रत्येक ख में एक-एक खत खुमरी नामक समिति हुआ करती थी। इसका मुखिया खत सयाणा कहलाता था। खत खुमरी द्वारा दो या अधिक गांवों के बीच के मामलों, मालगुजारी या दीवानी मामलों का निपटारा किया जाता था।

जौनसार क्षेत्र के प्रसिद्ध व्यक्ति 

वीर केसरीचन्द


इनका जन्म 1 नवम्बर 1920 को चकराता के पास क्यावा गांव में हुआ था। ये सेना में थे लेकिन बाद में बोस की आजाद हिन्द फौज में भर्ती हो गये थे। अतः इन पर मुकदमा चलाया गया और 3 मई 1945 को फांसी की सजा दी गई। इनके बलिदान दिवस पर 3 मई को चोलीथात में मेला लगता है।

केदार सिंह


बिसोई ग्राम के निवासी केदार सिंह जौनसार के प्रथम समाजसेवी हैं। इन्हें जौनसार-बावर में समाज सेवा एवं जन जागृति का अग्रदूत माना जाता है।

पं. शिवराम


कविता के क्षेत्र में प्रतिष्ठा रखने वाले आशुकवि पं. शिवराम जौनसार के प्रथम कवि हैं। इनकी प्रसिद्ध रचना ‘वीर केसरी’ जौनसार-बावर में बहुत प्रसिद्ध है।

भाव सिंह चौहान


प्रथम जौनसारी व्यक्ति जिन्होनें मसूरी एवं इलाहाबाद विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त किया तथा अन्तर्राष्ट्रीय खेल जगत में विशिष्ट उपलब्धि हासिल कर जौनसार बाबर का नाम रोशन किया। फादर ऑफ जौनसार बाबर सम्मान से सम्मानित होने वाले जौनसार क्षेत्र के ये प्रथम व्यक्ति है।

गुलाब सिंह


इनका जन्म बावर क्षेत्र के वृनाड ग्राम में हुआ था। राजनीति के क्षेत्र में अजय रहने वाले श्री गुलाब सिंह उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री रह चुके हैं। इन्हें जौनसार में राजनीतिक जागरूकता का जनक माना जाता है। इस क्षेत्र से मंत्री बनने वाले ये प्रथम व्यक्ति थे।

रतन सिंह जौनसारी


कविता के माध्यम से जौनसार को उजागर करने वाले रतन सिंह जौनसारी इस क्षेत्र के आधुनिक कवि हैं।

देविका चौहान


समाज सेवा से जुड़ी देविका चौहान ने महिला उत्थान में उल्लेखनीय कार्य किया है।

कृपाराम जोशी


प्रमुख शिक्षाविद् एवं समाज सेवी श्री जोशी ने जौनसार बावर मे समाज सेवा तथा विकास के लिए एक संगठन की स्थापना की है।

नन्द लाल भारती


जौनसार के संगीत जनक नंदलाल भारती जौनसार रत्न से सम्मानित हैं। इनका जौनसारी संगीत एवं संस्कृति के विकास में बहुत बड़ा योगदान हैं।

थारु

ऊधमसिंह नगर जिले में मुख्य रुप से खटीमा, किच्छा, नानकमत्ता और सितारागंज के 141 गावों में निवास करने वाला थारू समुदाय जनसंख्या की दृष्टि से उत्तराखण्ड व कुमायूं क्षेत्र का सबसे बड़ा जनजातीय समुदाय है। उत्तराखण्ड के अलावा ये उ.प्र. के लखीमपुर, गोंडा, बहराइच, महराजगंज, सिद्धार्थनगर, आदि जिलों, बिहार के चंपारण तथा दरभंगा जिलों तथा नेपाल के पूर्व में भेंची से लेकर पश्चिम में ‘महाकाली’ नदी तक तराई एवं भॉवर क्षेत्रों में फैले हुए हैं।

उत्पत्ति


सामान्यतः थारूओं को किरात वंश का माना जाता है जो कई जातियों एवं उपजातियों में विभाजित हैं। थारू शब्द की उत्पत्ति को लेकर में विद्वानों में मतभेद हैं। कुछ विद्वान राजस्थान के थार मरूस्थल से आकर बसने व अपने को राणाप्रताप का वंशज कहने के कारण इनका नाम ‘थारू’ पड़ने का समर्थन करते हैं ।

इन लोगों में ऐसी मान्यता है कि हमारे पूर्वज चित्तौड़गढ़ से लंका लड़ाई में गये थे लेकिन वहाँ डर के कारण थरथर कांपने लगे। थे। जिस कारण थारू कहलाएं और कालान्तर में तराई क्षेत्र में आकर बस गये।

शारीरिक गठन


ये लोग कद में छोटे, पीत वर्ण, चौड़ी मुखाकृति तथा समतल नासिका वाले होते हैं जो कि मंगोल प्रजाति के अत्यधिक निकट हैं। इनके पुरुषों की तुलना में स्त्रियां अधिक आकर्षक तथा सुंदर होती है।

भाषा


इनकी अपनी कोई विशिष्ट भाषा नहीं हैं। जिस भाषा क्षेत्र के समीप इनका निवास होता है प्रायः वही भाषा प्रयुक्त करते है।

अतः राज्य में निवास करने वाले थारू अवधी, मिश्रित पहाड़ी, नेपाली, भावरी आदि भाषाएं बोलते हैं।

वेशभूषा


इनके पुरूष हिन्दूत्व के प्रतीक के रूप में बड़ी चोटी रखतें हैं तथा धोती, लंगोटी, अगा, कुरता, टोपी व साफा पहनते हैं। जबकि स्त्रियां रंगीन लहंगा, काली ओढ़नी, चोली और बूटेदार कुर्ता पहनती हैं तथा शरीर पर गुदना गुदवाती और पीतल, चांदी व कांसे की आभूषण पहनती हैं। पुरूष भी अपने हाथ पर गुदने गुदवाते हैं।

आवास


ये लोग अपना मकान बनाने के लिए लकड़ी, पत्तों और नरकुल का प्रयोग करते हैं। दीवारों पर चित्रकारी होती है। प्रत्येक घर में पशुबाड़ा व घर के सामने प्रायः छोटा सा पूजा स्थल होता है ।

20 से 50 घरों के इनके गांव या पुरबे खेतो के निकट ही होते हैं ।

भोजन


इनका मुख्य भोजन चावल और मछली है। मछली और चावल के अलावा ये दाल, दूध, दही, मांस एवं अण्डे का भी प्रयोग करते हैं ।

तम्बाकू व मदिरा इनका मुख्य पेय है। मदिरा वे चावल द्वारा स्वयं निर्मित करते हैं जिसे वे ‘जाड़’ कहते हैं।

सामाजिक स्वरूप


सामाजिक रूप से ये कई गोत्रों या जातियों या कुरियों में बंटे होते हैं। बड़वायक, बट्ठा, रावत, वृत्तियां, महतोडहैत इनके प्रमुख गोत्र या घराने हैं। बड़वायक सबसे उच्च माने जाते हैं।

पहले इनमें बदला विवाह प्रथा का अर्थात बहनों के आदान प्रदान का प्रचलन था लेकिन अब ‘तीन टिकठी व अन्य प्रथाएं प्रचलित हैं। दोनों पक्षों की ओर से विवाह तय कर लिए जाने को ‘पक्की पोढ़ी’ कहते है।

विवाह की सगाई रस्म को इनमें ‘अपना पराया’ कहा जाता – है। सगाई के बाद और विवाह से लगभग 10-15 दिन पूर्व लड़के पक्ष के लोग लड़की के घर जाते है और विवाह की तिथि निश्चित करते हैं । इस रस्म को बात कट्टी कहा जाता है।

इनमें विवाह प्रायः माघ या फुलौरा दूज में होता है। विवाह के बाद लड़की एक दिन के लिए लड़के घर आती है फिर अपने भाई या पिता के साथ लौट जाती है।

विवाह के दो या तीन माह बाद चैत्र या बैशाख माह में लड़की स्थाई रूप से अपने पति के घर जाती है। इस रस्म को चाला कहते हैं।

इनमें विधवा विवाह की भी प्रथा है। यदि कोई विवाहित लड़की जिसका गौना (चाला) न आया हो अथवा उसका पति मर जाए तो लड़की का पिता उसे किसी के घर भेजकर बिरादरी को एक भोज देता है। इस प्रकार के विवाह भोज को ‘लठभरवा भोज’ कहते हैं।

इनमें मुख्यतः एक पत्नी विवाह ही प्रचलित है लेकिन आवश्यकतानुसार बहुपत्नी विवाह भी हो सकता है।

इनमें महिलाओं को पुरूषों की अपेक्षा उच्च स्थान प्राप्त है। इसी कारण कई परिवारों में पुरुष को भोजनालय में जाने का अधिकार नहीं है।

इनमें संयुक्त एवं एकाकी परिवार प्रथा मिलती है, जिसका मुखिया परिवार का सबसे वृद्ध व्यक्ति होता है।

इस समाज में मातृसत्तात्मक, पितृवंशीय एवं पितृस्थानीय पारिवारिक परम्परा पाई जाती है।

धर्म


थारू हिन्दू धर्म को मानते हैं। पछावन, खड्गाभूत, काली, नगरयाई देवी, भूमिया (बड़ा बाबा), कारोदेव, राकत, कलुवा सहित अनेक देवी-देवताओं, भूत-प्रेतों तथा अपने पूर्वजों की पूजा करते हैं। कुछ देवताओं को ये बकरा, मुर्गा, सुअर व शराब आदि चढ़ाते हैं।

त्यौहार


दशहरा, होली, दीपावली, माघ की खिचड़ी, कन्हैया अष्टमी और बजहर इनके प्रमुख त्यौहार हैं। बजहर नामक त्यौहार ज्येष्ठ या बैशाख में मनाया जाता है। होली फाल्गुन पूर्णिमा से आठ दिनों तक मनाया जाता है, जिसमें स्त्री और पुरूष दोनों मिलकर खिचड़ी नृत्य करते हैं।

राजनैतिक व्यवस्था


इन की अपनी पंचायतें तथा ग्रामीण अदालतें होती हैं। पराजित पक्षों को शारीरिक और आर्थिक दंड दिया जाता है।

अर्थव्यवस्था


थारू लोग प्रायः सीधे – सादे और ईमानदार होते हैं। इनका आर्थिक जीवन सामान्य रूप से कृषि, पशुपालन व आखेट पर आधारित है। कुमायूँ तराई क्षेत्र के थारू स्थाई कृषक पशुपालक व आखेटक होते हैं, तो भारत-नेपाल के दक्षिण-पूर्वी सीमावर्ती क्षेत्रों के थारू चलवासी कृषक व आखेटक होते हैं। ये मुख्य रूप से धान की खेती करते हैं। इसके अलावा दाल, तिलहन, गेहूँ एवं सब्जियों की भी खेती व मछली का शिकार करते हैं। गाय, भैंस, भेड़, बकरी, मुर्गी आदि पशुओं का पालन दूध, ऊन तथा मांस के लिए करते हैं।

इनके अन्य व्यवसायों में लकड़ी-ढुलाई, लकड़ी कटाई, शिकार, वन से लकड़ी, जड़ी-बूटी, फल-फूल, एकत्र करना और कुटीर उद्योग प्रमुख हैं। शिक्षित थारू सरकारी नौकरी भी करते हैं।

भोटिया

किरात वंशीय भोटिया एक अर्द्धघुमंतू जनजाति है। ये अपने को खस राजपूत कहते हैं। कश्मीर के लद्दाख में इन्हें भोटा और हिमाचल प्रदेश के किनौर में इन्हें भोट नाम से जाना जाता है, जबकि राज्य के पिथौरागढ़ जिले के तिब्बत व नेपाल से सटे सीमावर्ती क्षेत्र (भोट प्रदेश) में इन्हें भोटिया कहाँ जाता है। मारछा, तोल्छा, जोहारी, शौका, दरमिया, चौंदासी, व्यासी, जाड, जेठरा व छापड़ा (बखरिया) आदि उपजातीय नामों से ये राज्य के पिथौरागढ़, चमोली तथा उत्तरकाशी जिलों के उत्तरी भागों में स्थित भागीरथी, विष्णुगंगा, नीति, जाड़गंगा, व्यास, जोहार व चौदश आदि घाटियों तथा वृहद् हिमालय के ऊँचाई वाले क्षेत्रों में स्थित लगभग 291 ग्रामों में निवास करते हैं। उत्तरकाशी में अंगर, जादूंग व नेलंग, चमोली में माणा, मलारी, नीति व टोला तथा पिथौरागढ़ में डुंग, मिलम, तेडांग, मर्तोली, जोलिंग व कोंग कुटी व आदि भोटांतिकों के अंतिम गांव हैं। भोटिया महा हिमालय की सर्वाधिक जनसंख्या वाली जनजाति है।

गढ़वाल के चमोली में ‘मारच्छा’ व ‘तोलच्छा‘ तथा उत्तरकाशी में ‘जाड़’ भोटिया रहते हैं जबकि कुमाऊं के पिथौरागढ़ में ‘जोहारी, दर्मियां, चौदांसी, व्यासी एवं शौका’ भोटिया रहते हैं।

भाषा


ये हिमालय के तिब्बती बर्मी भाषा परिवार से संबंधित 6 बोलियां (भोटिया, शौका आदि) बोलते हैं।

शारीरिक संरचना


शारीरिक संरचना की दृष्टि से ये तिब्बती एवं मंगोलियन जाति के मिश्रण हैं। इनका कद छोटा, सिर बड़ा, चेहरा गोल, आंख छोटी, नाक चपटी, वर्ण पीत लिए गौर, शरीर पर बालों की कमी तथा बालों का रंग भूरा होता है।

आवास निवास


भोटिया शीतकाल के अलावा वर्ष भर 2, 134 – से 3,648 मीटर की ऊंचाई वाले स्थानों, जहाँ चारागाह की सुविधा हो पर अपना आवास ( मैत) बनाकर रहते हैं। शीतकाल के आरंभ होते ही ये अपने परिवार एवं पशुओं के साथ ‘गुण्डा’ या ‘मुनसा’ (शीतकालीन आवास) में आ जाते हैं। इनके आवास में लकड़ी का प्रयोग अधिक किया जाता है। दरवाजा छोटा बनाया जाता है।

परिधान


इनके पुरूष रंगा (घुटनों तक का कोट), गैजू या खगचसी (ऊनी पाजामा), चुंगठी या चुकल (टोपी) व बांखे (ऊनी जूता) पहनते हैं।

इनकी स्त्रियां च्युमाला (पूरी वाह का मैक्सीनुमा वस्त्र), च्युं (आधी वांह का मैक्सीनुमा वस्त्र), च्यूंकला (टोपीनुमा वस्त्र), ज्यूख्य (कमर में बांधने वाला वस्त्र), च्युब्ती, ज्यूज्य (कमर में लपेटने का वस्त्र) आदि वस्त्र धारण करती हैं।

इनकी स्त्रियां लक्क्षेप (अंगूठी), बीरावाली (सिर आभूषण), पतेली बाली (सिर आभूषण), छांकरी वाली (सिर आभूषण), बलडंग (चांदी के सिक्कों की माला), खोंगली (हंसुली), मंसाली (मनका माला), आदि आभूषण (साली पुली) धारण करती हैं। कलाई व ठोड़ी पर गुदना भी कराती हैं।

भोजन


चावल या मंडुवा का भात (छाकू), सामान्य रोटी (कुटो), बड़े आकार की रोटी (पूली), पतौड़ा, जौ-मंडुवा-गेहूँ का सत्तू (सिल्दू), दाल-सब्जी (छामा) व मांस इनके मुख्य भोजन हैं। मांस को ये शीतकाल के लिए सुखाकर भी रखते हैं।

ज्या (दूध, मक्खन, चायपत्ती, नमक, एक वृक्ष की छाल व गर्म पानी को आपास में मथ कर तैयार पेय) व च्यकती या छंग (शराब) इनके पेय हैं। ज्या का प्रयोग अधिक करते हैं, जबकि चमकती या छंग का प्रयोग विशेष अवसरों पर करते हैं।

सामाजिक व्यवस्था


इनमें पितृसत्तात्मक एवं पितृस्थानीय प्रकार का परिवार (मवासा) पाया जाता है। ये लोग परिवार के बुजुर्ग को बहुत सम्मान देते हैं। संपत्ति का विभाजन पिता के जीवित रहते हो जाता है। स्त्रियों को भी पुरूषों के समान ही अधिकार प्राप्त है।

पहले इनमें युवा गृहों (रंग बंग) का प्रचलन था। गांव के बाहर एक अलग गृह बनाया जाता था, जिसमें रात्रि काल में गांव के सभी अविवाहित युवक-युवतियां नृत्य व गीत आदि के माध्यम से मनोरंजन व विचारों का आदान-प्रदान करते हुए निवास करते थे। युवक-युवतियों के बीच यहाँ स्थापित प्रेम सम्बंध कभी-कभी विवाह में भी परिणति हो जाता था।

इनमें एक पत्नी प्रथा प्रचलित है तथा विवाह संबंध माता-पिता द्वारा तय किए जाते हैं। रिश्ता प्रायः वर पक्ष की ओर से भेजा जाता है तथा वैवाहिक कार्यक्रम शीतकालीन अधिवासों में सम्पन्न किया जाता है। कुछ भोटिया समाज में विवाह (दामी) की दो प्रथायें (तत्सत व दामोला) देखने को मिलती हैं। पहले के तहत बाराती कन्या के यहाँ जाते हैं, जबकि दूसरे के तहत बारातियों द्वारा कन्या को लाया जाता है। कहीं-कहीं सगाई (थौची) की रश्म देखने को मिलता है। इस समाज में कुछ मात्रा में वधु-शुल्क प्रथा का भी प्रचलन है। इससे समाज में स्त्रियों के उच्च स्थिति का परिचय मिलता है। विवाह के अवसर पर हाथों में रूमाल लेकर ‘पौणा नृत्य’ होता है।  

कुछ मात्रा में इनमें भावज-देवर विवाह, गन्धर्व विवाहपुनर्विवाह भी मिलता है, लेकिन बाल विवाह नहीं होता है।  

इनमें नातेदारी व्यवस्था हिंदू समाज की तरह ही सामान्य रूप से विद्यमान है तथा नजदीकी नातेदारों में यौन संबंध निषिद्ध है । अपने संबंधियों को भोटिया ‘स्वारा’ कहतें है।

इनमें वरिष्ठ व्यक्तियों को प्रणाम घुटनों पर सिर झुकाकर किया जाता है और उसका उत्तर वरिष्ठ व्यक्ति द्वारा उसके गालों पर सहलाकर दिया जाता है।

धर्म


उत्तरकाशी में रहने वाली कुछ भोटिया जनजातियों के अलावा, जिन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया है, सभी हिन्दू धर्म मानते हैं।

भोटिया अपनी रक्षा तथा मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए भूम्याल, ग्वाला, बैग रैग चिम, नंदादेवी, दुर्गा, कैलाशपर्वत, द्रोणागिरी, हाथी पर्वत आदि देवी-देवताओं की पूजा करते हैं। भूम्याल आदि देवों को प्रसन्न करने के लिए ये पशुओं की बलि भी देते हैं।

घंटाकर्ण, सिध्वा, विहवा व साईं आदि देवों की पूजा ये अपने पशुओं की रक्षा के लिए करते हैं।

भोटिया समाज में मृतक की आत्मा की शांति के लिए ग्वन संस्कार किया जाता हैं।

इनमें प्रत्येक 12वें वर्ष कंडाली नामक उत्सव मनाया जाता है। 

मनोरंजन


तुबेरा (रसिया जैसा गीत), बाज्यू (वीर रस प्रधान – गीत), तिमली (सामाजिक विषय पर गीत) आदि इनके लोकगीत हैं। ये अपना विशेष वाद्ययंत्र ‘हुड़के’ को बजाकर मनोरंजन करते हैं।

अर्थव्यवस्था


इनका आर्थिक जीवन कृषि, पशुपालन, व्यापार ऊनी दस्तकरी पर आधारित है। ये पर्वतीय ढालों पर ग्रीष्मकाल में सीढ़ीनुमा खेती करते हैं। यहां पर झूम प्रणाली की तरह ‘काटिल विधि’ से वनो को आग से साफ कर खेती योग्य भूमि तैयार की जाती है।

ये थोड़ी मात्रा में मंडुवा, फाफर, जौ, गेहूँ, आलू आदि पैदा कर लेते हैं।

ये भेड़, बकरी, जीबू (गाय की भांति एक जानवर) आदि पशुओं का पालन करते हैं।

चीन द्वारा तिब्बत पर कब्जा करने से पूर्व ये लोग तिब्बत से नीति – माणा, जोहार, दारमा, व्यास आदि दर्रों के माध्यम से मितुर की मध्यस्थता में गमय्या पद्धति ( इस पद्धति में एक ही पत्थर के दो टुकड़े कर एक उस मितुर (मध्यस्थ ) और एक इस मितुर (मध्यस्थ) के पास प्रतीक के रूप में रखा जाता था) से व्यापार करते थे। अब तिब्बत के बजाय देश में ही मैदानी भागों से ऊनी वस्त्र, ऊनी कालीन, सस्ते आभूषण, हींग, जड़ी-बूटियों आदि का व्यापार करते हैं।

अब धीरे-धीरे शिक्षा ग्रहण कर ये प्राइवेट व सरकारी सेवाओं से भी रोजगार प्राप्त करने लगे।

बोक्सा

बोक्सा उत्तराखण्ड के तराई-भॉवर क्षेत्र में स्थित ऊधमसिंह नगर के बाजपुर, गदरपुर एवं काशीपुर, नैनीताल के रामनगर, पौढ़ी के गढ़वाल के दुगड्डा तथा देहरादून के विकास नगर, डोईवाला एवं सहसपुर विकासखण्डों के लगभग 173 ग्रामों में निवास करते है। ऊधमसिंह नगर के बाजपुर, काशीपुर, गदरपुर आदि स्थानों पर इनकी संख्या अधिक है।

नैनीताल व ऊधमसिंह नगर जिलों के बोक्सा बहुल क्षेत्र को बुकसाड़ कहा जाता है।

बोक्सा अपने को पंवार राजपूत बताते है। कुछ विद्वान इन्हें मराठो द्वारा भगाये गये लोगों का वंशज मानते हैं। तो कुछ विद्वान चित्तौड़ पर मुगलों के आक्रमण के समय राजपूत स्त्रियां और उनके अनुचर भागकर यहाँ आने और उन्हीं के वंशज होने को मानते हैं। ऐसा कहा जाता है कि बोक्सा सर्वप्रथम बनबसा (चम्पावत) में 16वीं शताब्दी में आकार बसे थे।

शारीरिक रचना


इन लोगों का कद और आंखें छोटी, पलकें भारी, चेहरा चौड़ा, होंठ पतले एवं नाक चपटी होती है। इनके जबड़े मोटे और निकले हुए तथा दाढ़ी और मूंछे घनी और बड़ी होती है। स्त्रियों में गोल चेहरा, गेहुंआ रंग तथा मंगोल नाक नक्श स्पष्ट रूप से दिखायी पड़ते है। अतः स्पष्ट है कि इनकी शारीरिक बनावट मिश्रित प्रजातीय लक्षणों को इंगित करते हैं ।

भाषा


इन लोगों को अपनी कोई विशिष्ट बोली नहीं है, बल्कि जिस क्षेत्र में निवास करते हैं वहीं की बोली बोलते हैं। जैसे भावरी, कुमय्याँ, रच भैंसी आदि।

परिधान


इनके पुरूष धोती, कुर्ता, सदरी और सिर पर पगड़ी धारण करते हैं। नगरों में रहने वाले पुरूष शर्ट, कोट, पैंट आदि पहनते है।

स्त्रियां पहले ढीला लहंगा और चोली (अंगिया) के साथ ओढ़नी ओढ़ती थी लेकिन अब साड़ी, ब्लाउज, स्वेटर आदि का प्रचलन सामान्य हो गया है।

सामाजिक व्यवस्था


सामान्य रूप से सामान्य रूप ये 5 गोत्रों या उपजातियों (यदुवंशी, पंवार, राजवंशी, परतजा व तनवार) में विभक्त हैं। देहरादून में कुछ संख्या में एक अलग प्रकार के महर बोक्सा पाये भी जाते हैं। गोत्र इनके समाज की व्यावहार मूलक सामाजिक इकाई है। एक गोत्र के लोग आपस में विवाह नहीं कर सकते हैं। विवाह परिपक्व होने पर ही किया जाता है।

यद्यपि इनमें एक-विवाह तथा बहु-विवाह दोनों का प्रचलन है, लेकिन धीरे-धीरे एक-विवाह अधिक लोकप्रिय हो रहा हैं।

इनमें ज्यादातर संयुक्त और विस्तृत परिवार पाये जाते हैं। लेकिन कुछ केंद्रीय परिवार भी देखने को मिलते हैं। अब धीरे-धीरे इनका झुकाव केंद्रीय परिवार की ओर बढ़ता जा हो रहा है।

परिवार पितृवंशीय और पितृसत्तात्मक होता है। यद्यपि सम्पत्ति का हस्तांतरण पिता से पुत्र को होता हैं, लेकिन पुत्री को भी सम्पत्ति का उत्तराधिकारिणी माना जाता है। समाज में स्त्रियों की स्थिति उच्च हैं।

धर्म


बोक्सा हिंदू धर्म के काफी निकट हैं। ये लोग महादेव, काली, दुर्गा, लक्ष्मी, राम, कृष्ण तथा अपने स्थानीय देवी-देवताओं (ग्राम खेड़ी देवी, साकरिया देवता, ज्वाल्पादेवी, हुल्का देवी, चौमुंडा देवी आदि) आदि की पूजा करते हैं।

काशीपुर की चौमुंडा देवी इस क्षेत्र के बोक्साओं की सबसे बड़ी देवी मानी जाती है।

ग्राम देवी (खेड़ी देवी) व ग्राम देवता (साकरिया) की पूजा पवित्र स्थान पर की जाती है जो गांव के बाहर होता है और जिसे ‘थान’ कहा जाता है। ग्राम देवी व ग्राम देवता को वे वर्ष में दो बार विशेष पूजा देते हैं।

इनमें जादू-टोने, टोटके, भूत-प्रेत व तंत्र-मंत्र भी देखने को मिलता है।

ये बुज्जा (कल्पित आत्माओं) की भी पूजा करते हैं। मृतक का दाह-संस्कार किया जाता है।

त्यौहार


चैती, नौबी, होली, दीपावली, नवरात्रि आदि इनके प्रमुख त्यौहार हैं। चैती इनका एक महत्वपूर्ण त्यौहार एवं मेला है। होगण, ढल्या, गोटरे व मौरो आदि भी इनके त्यौहार है।

अर्थव्यवस्था


पहले इनका आर्थिक जीवन जंगली लकड़ी, शहद, फल-फूल-कन्द, जंगली जानवरों के शिकार व मछली पर आधारित था, लेकिन अब कृषि, पशुपालन एवं दस्तकारी इनके आर्थिक जीवन का मुख्य आधार है।

इनमें लगभग प्रत्येक व्यक्ति कृषि कार्य, लकड़ी तथा लोहे का काम, मकान बनाना, डलियां बनाना, जाल तथा बर्तन बनाना जानता है।

इनका प्रमुख भोजन मछली और चावल हैं। इसके अतिरिक्त ये लोग मक्का और गेहूं की रोटी और दूध दही का प्रयोग करते हैं। इनके पुरुष मदिरा, ताड़ी, हुक्का, बीड़ी, सुल्फा का प्रयोग अधिक करते हैं।

राजनीतिक व्यवस्था


बोक्सा समाज की सबसे छोटी इकाई परिवार है। कई परिवारों से मिलकर एक बोक्सा गांव (मंझरा) का निर्माण होता है। गांव में छोटे-मोटे विवादों के निपटारे के लिए एक समिति होती है जिसका एक प्रधान (मुखिया) होता है जो गांव के स्तर पर सर्वोच्च होता है।

कहीं-कहीं इनमें 5 सदस्यीय एक विरादरी पंचायत होती। जोकि न्याय एवं कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए उत्तरदायी हैं। इस पंचायत के नीचे एक मुंसिफ, एक दरोगा और दो सिपाही होते हैं। इन सभी के अधिकार वंशगत होते हैं और इन्हें समाज में बड़े सम्मान से देखा जाता है।

अब धीरे-धीरे इनकी यह पुरानी व्यवस्था लुप्त हो रही है और नैनी व ऊधमसिंह नगर जिले में बोक्सा परिषद की स्थापना की गई है। उसके स्थान पर नई पंचायती राज व्यवथा अपनी जगह बनाती जा रही है।

राजी

राजी मुख्यतः पिथौरागढ़ जनपद के धारचूला, कनाली छीना एवं डोडीहाट विकास खण्डों के 7 गांवो (चिपलथड़ा, मान गौथा विखा, किमखोला, चौराणी, जमतड़ी, कनाकन्याल आदि) में, चम्पावत के एक गांव में व कुछ संख्या में नैनीताल में निवास करते हैं। सन 2001 में इनके परिवारों की कुल संख्या 130 तथा इनकी कुल जनसंख्या लगभग 528 थी।

विद्वानों का मत है कि प्राचीन काल में गंगा पठार में पूर्व से लेकर मध्य नेपाल तक के क्षेत्र में आग्नेयवंशीय कोल-किरात जातियों का निवास था। कालान्तर में इन्हीं के वंशज राजी के नाम से जाने गए।

ये लोग प्राचीन काल से ही जंगलों में निवास करते हैं। ये लोग अपने को हिन्दू कहते हैं और वर्ण क्रम में अपने को रजवार (राजपूत) मानते हैं।

इनको बनरौत, बनराउत, बनरावत, जंगल के राजा आदि नामों से भी संबोधित किया जाता है, लेकिन राजी नाम अधिक प्रचलित है।

शारीरिक गठन


ये कद में छोटे तथा चपटे मुख वाले होते हैं। इनकी काठी मजबूत तथा होंठ कुछ बाहर की ओर मुड़े हुए होते हैं। बाल घुमावदार होता है। शरीर का वर्ण सामान्य काला व कुछ कुछ पीलापन लिए होता है।

भाषा


इनकी भाषा में तिब्बती और संस्कृत शब्दों की अधिकता पायी जाती है, किंतु मुख्यता मुंडा बोली के शब्दों की होती है। इस बोली का प्रयोग ये स्थानीय रूप से ही करते हैं, वाह्य संपर्क हेतु ये कुमाऊंनी का प्रयोग करते हैं।

वस्त्र, आवास एवं भोजन


राजी जनजाति के पुरूष धोती, अंगरखा व पगड़ी धारण करते हैं। ये चोटी भी रखते हैं। महिलाएं लहंगा, चोली, ओढ़नी धारण करती हैं। इनमें गोदना गुअवाने का प्रचलन है।

पहले ये अधिकांशतः वनों में निवास करतें थे, लेकिन अब ये झोपड़ियों में निवास करते हैं। अपने आवास को ये रौत्यूड़ा कहते हैं।

पहले ये अपना पोषण जंगल में ही फल-फूल, कंद व मांस से करते थे, लेकिन अब ये सीमित स्तर पर कृषि, दस्तकारी व मजदूरी से करते है। मंडुवा, मक्का, दाल, सब्जी, भट, मछली, मांस, जंगली फल, कंदमूल व अनेक जंगली वनस्पतियां इनके भोजन हैं।

सामाजिक व्यवस्था


विवाह इनमें दो परिवारों के बीच एक समझौता माना जाता है। ये हिंदुओं की तरह अपने गोत्र में विवाह नहीं करते हैं। विवाह के पूर्व ‘सांगजांगी’पिंठा संस्कार सम्पन्न होता है। बच्चों का विवाह प्रायः कम आयु में कर दिया जाता है। पहले इनमें पलायन विवाह का भी प्रचलन था ।

इनमें वधू मूल्य का प्रचलन है, विवाह के बाद पति अपने ससुर के घर रहने लगता है। इनमें विवाह-विच्छेद व पुनर्विवाह के लिए स्त्री व पुरूष को समान अधिकार प्राप्त है।

पहले इनमें शिक्षा के प्रति बिल्कुल लगाव नहीं था। बच्चों को ये विभिन्न कार्यों में नियोजित कर देते थे। अब इनमें धीरे-धीरे शिक्षा के प्रति जागृति आ रही है।

धर्म एवं विश्वास


इन लोगों का विश्वास है कि देवी-देवता पहाड़ की चोटी, नदी, तालाब और कुओं में रहते हैं। ये बाघनाथ, मलैनाथ, गणनाथ, सैम, मलिकार्जुन, छुरमल, नंदादेवी आदि देवी-देवताओं को पूजते हैं। इनके मुख्य देवता बाघनाथ हैं। ये हिन्दू धर्म को मानते हैं।

इनमें जिस स्थान पर किसीकी मृत्यु हो जाती है उस स्थान पर उसके बाद कोई नहीं रहता है। मृतकों को गाड़ने व जलाने की परम्परा है।


रीति-रिवाज


कारक (कर्क) और मकारा (मकर) की संक्रान्ति इनके दो प्रमुख त्यौहार हैं। इन त्यौहारों पर सभी परिवारों में पकवान आदि बनाये जाते हैं।

विशेष अवसरों पर ये थड़िया जैसा (गोले में होकर) नृत्य करते हैं। 

अर्थव्यवस्था


ये काष्ठ कला में निपुण होते हैं। कुछ समय पूर्व तक ये लकड़ी के घरेलू समान या लकड़ी के गठ्ठर से आस पास के गांवों में मूक या अदृश्य विनिमय द्वारा अपने आवश्यकता की सामग्री प्राप्त करते थे। उन्हें जिन चीजों की आवश्यकता होती थी, उसका एक छोटा सा टुकड़ा अपने द्वारा बनाये गये वस्तुओं या लकड़ी के गठ्ठर में चिपकाकर रात के समय आस पास के गांवों में जाकर लोगों के घर के बाहर छोड़ आते थे। अगले दिन लोग उस सामग्री को लेकर उसी स्थान पर उनके आवश्यकता की सामग्री रख देते थे, जिसे वे रात्रि में उठा ले जाते थे।

इनके कुछ परिवार अभी भी घुमक्कड़ी अवस्था में जीवनयापन कर रहे हैं, लेकिन ज्यादातरलोग झुमविधि से थोड़ी बहुत कृषि करने लगे हैं। कृषि के साथ-साथ ये आखेट, पशुपालन, व वन उत्पाद संग्रहण भी करते हैं। वन की कटाई पर रोक लगने के कारण ये अब बाहर निकलकर मजदूरी भी करने लगे हैं। 

अभाव एवं कुपोषण के कारण इनकी संख्या दिनों-दिन घट रही है।

इन्हें भी जानिए!

जौनसारी जनजाति के लगभग 95% लोग देहरादून जिले में रहते हैं। 

थारू जनजाति के लगभग 90% लोग ऊ. सि. न. जिले में रहते हैं।

‘बोक्सा’ जनजाति के लगभग 61% लोग नैनीताल व ऊधमसिंह नगर जिलों में लगभग 32% लोग देहरादून जिले में और शेष पौढ़ी जिले में निवास करते हैं।  

‘राजी’ जनजाति के लगभग 66% लोग पिथौरागढ़ जिले में रहते हैं।

जाड़ भोटिया की ही एक उपजाति हैं जो कि उत्तरकाशी जिले के सुदूर | उत्तर में भागीरथी घाटी में रहते हैं। जादुंग इनका मूल गांव है। इनके मूल गांव के पास ही जनक ताल स्थित हैं। ये अपने को जनक का वंशज मानते हैं।

जाड़ में विघटित परिवार व्यवस्था पाई जाती है। यद्यपि पुत्र के बड़े होने पर | माता-पिता पुत्र को परिवार से अलग कर देते हैं फिर भी पुत्र व पुत्री का पिता की सम्पत्ति पर समान अधिकार होता है।

यद्यपि जाड़ बौद्ध धर्मानुयाई होते हैं और इनमें ब्राह्मण कर्म करने वाले को लामा कहते हैं, फिर भी इनमें हिन्दू संस्कृति के तत्व पाये जाते हैं।

जाड़ की बोलचाल की भाषा रोम्बा है, जो कि गढ़वाली की अपेक्षा तिब्बती के अधिक निकट है।

जाड़ पुरूष तिब्बतियों की तरह घुटनों तक का चोगा ( बपकन), पाजामा, हिमाचली टोपी व जूता (पैन्तुराण) पहनते हैं, जबकि स्त्रियां पांव तक चोंगा (कौलक), कमर पर कपड़े का बंधन (केरक), टोपी व जूता पहनती हैं।

लौहसर (वसंत पंचमी को, वर्ष का प्रथम दिन) व शूरगैन (भाद्र माह के 20वें दिन से) जाड़ लोगों के प्रमुख त्यौहार हैं ।

जाड़ की स्त्रियां ऊन का कंबल, चुटका, पंखी, टूमकर, थुलमा, पट्टू, फांचा, आंगड़ा आदि वस्त्र बनाती हैं। इनके आवास कलात्मक होते हैं।

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